₹2,000 करोड़ के ईडी छापे में फंसे कर्नाटक के विधायक के.सी. वीरेन्द्र: सोना, सट्टा और सियासी संग्राम
ईडी की जांच में उजागर हुआ बड़ा ऑनलाइन सट्टेबाज़ी नेटवर्क
के.सी. वीरेन्द्र मनी लॉन्ड्रिंग केस ने कर्नाटक की राजनीति में हलचल मचा दी है। कांग्रेस विधायक के.सी. वीरेन्द्र (48), जिन्हें लोकप्रिय रूप से “पप्पी” कहा जाता है, अब ईडी (Enforcement Directorate) की जांच के घेरे में हैं। ईडी ने वीरेन्द्र से जुड़ा एक बड़ा अवैध ऑनलाइन सट्टेबाज़ी रैकेट उजागर किया है।
ईडी की जांच में सामने आया कि वीरेन्द्र के नेटवर्क के ज़रिये कई ऑनलाइन सट्टेबाज़ी प्लेटफॉर्म संचालित किए जा रहे थे, जिनका टर्नओवर ₹2,000 करोड़ से अधिक था। इन अवैध सट्टे की कमाई को कई राज्यों में फैले फर्जी बैंक खातों (म्यूल अकाउंट्स) के माध्यम से घुमाकर मनी लॉन्ड्रिंग की गई। बताया जा रहा है कि यही रकम उनके शाही जीवनशैली, विदेश यात्राओं और महंगे ख़र्चों के लिए इस्तेमाल होती थी।
के.सी. वीरेन्द्र ने 2023 कर्नाटक विधानसभा चुनावों में चित्रदुर्ग विधानसभा क्षेत्र से जीत दर्ज की थी और पूर्व विधायक जी. एच. थिप्पारेड्डी को हराया था।
₹150 करोड़ की संपत्ति ज़ब्त: सोना, नकद, लग्जरी कारें और आभूषण
हाल के वर्षों की सबसे बड़ी कार्रवाई में, ईडी ने चल्लकेरे क्षेत्र में वीरेन्द्र के दो लॉकरों से 24 कैरेट सोने के 40 किलो बिस्कुट बरामद किए, जिनकी क़ीमत ₹50 करोड़ से अधिक बताई गई है।
पिछली छापेमारियों सहित, नकदी, गहनों, लग्ज़री वाहनों और बैंक जमा की कुल ज़ब्त संपत्ति अब ₹150 करोड़ से पार हो चुकी है। फिलहाल वीरेन्द्र न्यायिक हिरासत में हैं और जांच जारी है।
ईडी अधिकारियों के अनुसार, वीरेन्द्र की संपत्ति का यह जाल “जटिल और बहु-स्तरीय” है, जिसमें कई फर्जी खातों और कंपनियों का इस्तेमाल किया गया।
ईडी की कार्रवाई पर छिड़ा सियासी संग्राम
के.सी. वीरेन्द्र मनी लॉन्ड्रिंग केस ने कर्नाटक में सियासी घमासान खड़ा कर दिया है। भाजपा नेतृत्व वाले विपक्ष ने कांग्रेस सरकार पर आरोप लगाया कि वह भ्रष्ट नेताओं को बचा रही है और उन्हें आगामी चुनावों, विशेषकर बिहार चुनावों, के लिए फंड जुटाने में इस्तेमाल कर रही है।
विपक्ष का दावा है कि कांग्रेस ने कर्नाटक को “फंडरेज़िंग हब” बना दिया है और कई बड़े नेता इस तरह के अवैध नेटवर्क में शामिल हैं।
कांग्रेस ने आरोपों को बताया ‘राजनीतिक साज़िश’
कांग्रेस नेताओं ने इन आरोपों को राजनीतिक प्रतिशोध करार देते हुए कहा कि ईडी की कार्रवाई पार्टी की छवि खराब करने की सुनियोजित कोशिश है।
पार्टी प्रवक्ताओं का कहना है कि विपक्षी विधायकों पर चयनात्मक कार्रवाई से यह साफ होता है कि केंद्रीय एजेंसियों का दुरुपयोग किया जा रहा है। उन्होंने यह भी जोड़ा कि सत्ता पक्ष के नेताओं के मामलों पर इतनी सख्त कार्रवाई कभी नहीं होती।
“यह सिर्फ़ वास्तविक शासन मुद्दों से ध्यान भटकाने की चाल है,” एक वरिष्ठ कांग्रेस नेता ने कहा।
मीडिया की चुप्पी पर उठे सवाल
के.सी. वीरेन्द्र मनी लॉन्ड्रिंग केस जैसे बड़े मामले पर राष्ट्रीय मीडिया की कवरेज बेहद सीमित रही है। आलोचकों का कहना है कि मुख्यधारा मीडिया की पक्षपातपूर्ण रिपोर्टिंग ने इस हाई-प्रोफाइल स्कैंडल को वह ध्यान नहीं दिया, जिसका वह हकदार था।
विश्लेषकों का मानना है कि अगर ऐसा मामला किसी और पार्टी या राज्य से जुड़ा होता, तो यह सप्ताहों तक सुर्खियों में रहता। इस मामले पर मीडिया की मौन प्रतिक्रिया ने एक बार फिर मीडिया की निष्पक्षता और राजनीतिक प्रभाव पर बहस छेड़ दी है।
जांच जारी: ईडी की निगरानी में कई और नाम
ईडी अब भी वीरेन्द्र के वित्तीय लिंक, संपत्तियों और सहयोगियों की जांच कर रही है। जैसे-जैसे न्यायिक प्रक्रिया आगे बढ़ रही है, जांच एजेंसियों को उम्मीद है कि इस ऑनलाइन सट्टेबाज़ी सिंडिकेट से जुड़े और भी नाम सामने आएंगे।
वीरेन्द्र न्यायिक हिरासत में बने हुए हैं, जबकि ईडी डिजिटल चैनलों और फर्जी खातों के ज़रिये धन के प्रवाह का पता लगाने में जुटी है।
कानूनी विशेषज्ञों के अनुसार, यह मामला भारत में ऑनलाइन सट्टेबाज़ी और डिजिटल मनी लॉन्ड्रिंग पर नकेल कसने के लिए एक मिसाल बन सकता है।
के.सी. वीरेन्द्र मनी लॉन्ड्रिंग केस भारत में राजनीति, शक्ति और भ्रष्टाचार के बीच गहरे संबंधों को उजागर करता है। ईडी की सख़्त कार्रवाई और बढ़ती राजनीतिक गर्मी इस केस को आने वाले चुनावों और भविष्य की एंटी-करप्शन सुधार नीतियों का केंद्र बना सकती है।














